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शुक्रवार, 4 मई 2012

ब्रक्षों


अहसास के पर 
उसके उगे नहीं है अब तक ,
बरना बो इतनी बेरुखी न रखता 
कबका गले लगा लिया होता ------अनुराग चंदेरी
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ब्रक्षों से बेहतर नहीं 
तुम्हारा चुप होना ,
क्या बात है 
चुप हो कर भी ,
कोई साजिश 
रचते हो .---------------------------अनुराग चंदेरी
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नदी

दूरियों कि नदी तो 
बना ली 
तुमने , मेरा यकीन है 
मै चाहत कि नाव
बना लाऊंगा 
तुमको दिल मै बसाया है 
रग़ रग मे
ले आऊंगा 
तुम कितनी भी गहरी नींद मे 
सो जाना 
मै सपना बन के आ जाऊंगा ----अनुराग चंदेरी

दर्द


मेरे हिस्से में 
दर्द भर होते 
तो क्या बात थी , 
मुझे तो झूंठा 
हँसना भी पड़ता है
उसके लिए ----------अनुराग चंदेरी
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श्रंगार

मैने कब चाहा
कि तुम मेरे 
जीवन के श्रंगार बनते 
तुम न आते करीव 
तो रिश्तों के 
न ये आकार बनते ,
अब तुम चले हो 
दूर मुझसे 
मेरे दिल में 
ग़मों के इतने प्रकार 
न बनते ----अनुराग चंदेरी

कसमे

कसमे खानी थीं 
तो खा ली ,
बादे भी किये बड़े बड़े 
और एक सच 
उन्हें पूरा भी किया 
फिर क्यों है तल्खी इतनी 
कि गले लगाते नहीं 
और दूर भी नहीं जाते -------अनुराग चंदेरी

घोंसला

कोई नहीं जान सका है 
की कितना दर्द सह के
नया घोंसला बनती है चिड़िया 
यह जानते हुए भी 
कि क्रूर हाथ 
अब भी तैयार खड़े है 
उसे मिटाने के लिए --------अनुराग चंदेरी

इश्क के हालात

इश्क के हालात बड़े 
नए हो गए 
डिजिटल युग मै ,
मै याद करता हूँ उसे 
बो फोन नहीं करता 
बस मिस काल करता है ------अनुराग चंदेरी

बुधवार, 2 मई 2012

जुदाई

किसी  शाम 
मुझे टूट के 
बिखरता देखो 
, मेरी रगों में 
ज़हर जुदाई का 
उतरता देखो 
किस किस अदा से उसे 
माँगा है रब से 
आओ  कभी मुझे 
सजदे में 
सिसकता देखो --------------
प्रेषक - अमरेन्द्र अमर , लखनऊ , 
उ. प्र.
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मंगलवार, 1 मई 2012

मालिक


मालिक

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शोषण की तस्वीर 
मैने
मालिक और मजदूरों के 
मध्य ही नहीं पायी ,
मैने जिसे दिल से 
चाहा बो 
मालिक बन गया 
और निर्मित हो गए 
शोषण के बड़े बड़े बाँध 
मेरे और उसके मध्य 
जिन्हें पार कर पाना
लगा मुझे
मानो 
जीवन में साम्यवाद लाना हो 

----अनुराग चंदेरी

जिन्हें बफाओं
पर यकीन था 
बे चुप रहे
और अन्धकार में खो गए,
जो बेबफा थे बे 
बे चिल्लाने के लिए 
उजालों में 
खड़े हो गए --------------------अनुराग चंदेरी

शनिवार, 28 अप्रैल 2012

अकेले भले


अकेले भले 
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उत्साह 
टूटता  चला 
जैसे जैसे 
तुम दूर चले 
मन की 
पगडंडियों मै 
हम न थे 
सूने भले 
आस 
भी जान जाती है 
हकीकत के 
पहाड़ों को 
तभी आँसूं 
बस रोने चले ,
क्यूँ  मिलन के 
गलियारों  में
प्यार भी 
एक राजनीति था 
बो दूर हो कर 
अब 
अजनवी बन 
हमसे मिलने चले ,
यकीन के 
जो शव्द कहा करते थे 
बे ही 
छल के सायों के
 साथ चले ,
न मिलते 
ऐसे साथी 
इनसे तो 
अकेले भले ........................अनुराग चंदेरी 

मलाल

मलाल
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ओंठों  पर
हँसी  रखता हूँ 
जी  हाँ 
मै खुश रहता हूँ 
यह  कहना  है
मेरे  सभी दोस्तों  का 
लेकिन  हँसी 
के गुब्बारों  मै भी 
मलाल उड़ते  रहते  हैं 
जो  अक्सर  कहते हैं  की 
मै  नादान सा 
क्यूँ 
ढ़ोता  रहा 
बह  अपनापन  
उनका 
जो मुझे 
मिला ही नहीं ----------------अनुराग चंदेरी 
 
 

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

फूल

जख्मों  के कांटे 
भी 
तरस खा के रो दिए 
पर  उन्हें दिखाई न दिए 
मेरे प्यार के 
फूल 
बे तो उलझे रहे खुद को 
पाक सिद्ध करने में .
---------------------------------अनुराग शर्मा 

मै और तुम


मै और तुम
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मन के दर्शन और 
तन के गणित मै 
खरा पाया 
देख समर्पण आपका 
मेरा रोम रोम भी
 कितना थर्राया 
मैने तुम्हारे मन के भावों में भी 
सागर सा गहरापन पाया,
अमिट विश्वास
रखा तुमने 
मुझ पर अपना तन मन वारा
अब इतने होने पर भी 
क्यूँ दूर तुम चले गए 
प्रिय 
जान सको तो जान लो
 कितना चाहा
है हम दोनों ने 
मै और तुम 
एक होकर यह एक बात जान लें 
की एक होना 
नियति न भी हो 
तो भी मन के मिलन को 
कोई भी दूरी 
मिटा नहीं सकती .
---------------------अनुराग चंदेरी