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बुधवार, 12 सितंबर 2012

कुछ का व्यवहार बदल गया / श्रीकांत वर्मा

कुछ का व्यवहार बदल गया। कुछ का नहीं 
बदला।
जिनसे उम्मीद थी, नहीं बदलेगा
उनका बदल गया।
जिनसे आशंका थी,
नहीं बदला।
जिन्हें कोयला मानता था
हीरों की तरह 
चमक उठे।
जिन्हें हीरा मानता था
कोयलों की तरह
काले निकले।

सिर्फ अभी रुख बदला है, आँखे बदली है,
रास्ता बदला है।
अभी देखो
क्या होता है,
क्या क्या नहीं होता।
अभी तुम सड़कों पर घसीटे जाओगे,
अभी तुम घसिआरे पुकारे जाओगे
अभी एक एक करके
सभी खिड़कियाँ बन्द होंगी
और तब भी तुम अपनी
खिड़की खुली
रखोगे,
इस डर से कि
जरा सी भी अपनी
खिड़की बन्द की तो
बाहर से एक पत्थर
एक घृणा का पत्थर
एक हीनता का पत्थर
एक प्रतिद्वन्दिता का पत्थर
एक विस्मय का पत्थर
एक मानवीय पत्थर
एक पैशाचिक पत्थर
एक दैवी पत्थर
तुम्हारी खिड़की के शीशे तोड़ कर जाएगा
और तुम पहले से अधिक विकृत नजर आओगे
पहले से अधिक
बिलखते बिसूरते नजर पड़ोगे
जैसा कि तुम दिखना नहीं चाहते
दिखाई पड़ोगे।

यह कोई पहली बार नहीं है
जब तुम्हें मार पड़ी है
कम से कम तीन तो
आज को मिला कर
हो चुके
मतलब है तीन बार,
मार।
और ऐसी मार कि तीनों बार
बिलबिला गया
निराला की कविता याद आती है
"जब कड़ी मारे पड़ीं,
दिल हिल गया।"

बफा

इस ज़माने में 
कहाँ बफा ढूडने की कोशिश 
करते हो --यारो ????
वो ज़माने और हुआ करते थे 
जब 
मकान कच्चे 
और लोग सच्चे 
हुआ करते थे ---अज्ञात

-अज्ञेय---तुम्हें नहीं तो किसे और-

तुम्हें नहीं तो किसे और----अज्ञेय

तुम्हें नहीं तो किसे और 
मैं दूँ 
अपने को 
(जो भी मैं हूँ)? 
तुम जिस ने तोड़ा है 
मेरे हर झूठे सपने को— 
जिस ने बेपनाह 
मुझे झंझोड़ा है 
जाग-जाग कर
तकने को
आग-सी नंगी, निर्ममत्व
औ' दुस्सह
सच्चाई को—
सदा आँच में तपने को—
तुम, ओ एक, निःसंग, अकेले,
मानव,
तुम को—मेरे भाई को!

कि हम नहीं रहेंगे --अज्ञेय

कि हम नहीं रहेंगे
--अज्ञेय
हमने 
शिखरों पर जो प्यार किया
घाटियों में उसे याद करते रहे!
फिर तलहटियों में पछताया किए
कि क्यों जीवन यों बरबाद करते रहे!

पर जिस दिन सहसा आ निकले
सागर के किनारे—
ज्वार की पहली ही उत्ताल तरंग के सहारे
पलक की झपक-भर में पहचाना
कि यह अपने को कर्त्ता जो माना—
यही तो प्रमाद करते रहे!

शिखर तो सभी अभी हैं,
घाटियों में हरियालियाँ छाई हैं;
तलहटियाँ तो और भी
नई बस्तियों में उभर आई हैं।

सभी कुछ तो बना है, रहेगा:
एक प्यार ही को क्या
नश्वर हम कहेंगे—
इस लिए कि हम नहीं रहेंगे?

एक रेशा चमक का

खो कर सब 
मै बैठा 
उदासी से बतियाता 
रहा ,तभी देखा कि
एक रेशा चमक का 
आँखों मे छिपा अब भी 
कुछ कहना चाह रहा है 
मैने उसे भी 
अबसर दिया 
कि कहे अपनी बात 
बह बोला
उठो ,चलो
हाथ पर हाथ मत रखो
अभी लड़ना है बहुत
आगे बढ़ना है बहुत ------अनुराग चंदेरी

गफलत में

जिंदगी कितनी 
गफलत में 
फ़साये है 
कभी लगता है 
की जीता जाऊं 
दोड़ता जाऊं 
समय से आगे 
और कभी लगता है 
की चिता खुद की 
मै ही सजाऊं ,
सोच के अस्थिर
जंगल में
भ्रम की नदियाँ
ले चली हैं बहा कर मुझे
क्या पता कहाँ -----------अनुराग चंदेरी

जान लेते हो सब

अब नहीं कहना जरा भी
तुमसे दिल कि बात 
क्या शख्स हो यार 
बगैर कहे जान लेते हो सब ------अनुराग चंदेरी